31 कंप्यूटर की बराबरी करने वाले महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की कहानी

हमारे देश में प्रतिभा की कमी नहीं है अभी हाल में आंइस्टीन के सिदांत को चुनोती देने वाले नारायण सिंह की हाल में ही मृत्यु हो गयी ,उनके बारे में ये कहा जाता है की अगर वो सरकारी उपेक्षा का शिकार न होते तो उनकी गिनती दुनिया के बड़े वैज्ञानिक में होती .उनके बारे में ये कहा जाता है की उनका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता था पर सरकार ने कभी भी उन पर ध्यान ही नहीं दिया .उनका 74 साल की उम्र में निधन हो गया वो दिमाग के बीमारी से लम्बे समय से पीड़ित थे पर क्या आप जानते है की उन्होंने आंइस्टीन के सिदांत को भी चुनोती दे दी थी .आये उनके बारे में और जानते है और उनसे जुड़े दिलचस्प किस्सों को सुनाते है .

बिहार के रहने वाले वसिष्ठ जी 1946 में पैदा हुए थे वो बचपन से ही बहुत ही मेघावी थे ,उन्होंने बिहार के सबसे बड़े नेतरहाट की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था .इनकी प्रतिभा को देखते हुए ही पटना विशवविधालय ने अपने नियम बदल कर और उनको एक साल में बी एस सी की डिग्री दे दी थी .उनकी प्रतिभा का इस बात से ही अंदाजा लगाया जाता है की जब उनके प्रोफ्फेस्सर उनको गलत पडाते थे तो उनको बीच में टोक देते थे .जिनके कारण उनको सारे यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक जी बुलाते थे उनको ,कॉलेज की पढाई के दौरान उन्हें अमेरिका आने का न्योता मिला और नारायण जी अमेरिका चले गए .और वहा से उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और वहा ही वो अध्यापक के रूप में नियुक्त हो गए .

नारायण जी ने कुछ दिन नासा में भी काम किया और उन्होंने आंइस्टीन के सिदांत को चुनोती दी ,वो भी अपने एक शोध पत्र के अनुसार जिसका नाम था द पिस ऑफ़ स्पेस थ्योरी और उन्हें पीएचडी की डिग्री भी इसी शोध के कारण मिली .उनके बारे में कहा जाता है की जब नासा अपोलो स्पेस यान लांच कर रही थी तो 31 कंप्यूटर बंद हो गए थे ,जब कंप्यूटर ठीक किये गए तो उन कंप्यूटर की गणना और नारायण जी की गणना एक समान निकली .पर बेहद अफ़सोस की बात है अंत समय में उनको एक एम्बुलेंस तक नहीं मिली .यही हमारे भारत देश की कमी है यहाँ टैलेंट बहुत है पर सरकार कभी ध्यान नहीं देती ,हमारी पूरी टीम की तरफ से उन्हें श्रदांजलि .

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